न्यूयॉर्क/नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 22 सितंबर 2006 को संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र को संबोधित किया. इस दौरान उन्होंने ईरान युद्ध से लेकर गाजा, रूस-यूक्रेन युद्ध, वेनेजुएला, क्यूबा, अवैध इमिग्रेशन, ग्रीनलैंड और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तक कई अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अमेरिका का रुख सामने रखा। करीब 35 मिनट के भाषण में ट्रंप ने अपनी सरकार की विदेश नीति को अमेरिकी शक्ति और राष्ट्रीय हितों से जोड़ते हुए पेश किया।

ईरान पर सबसे कड़ा संदेश
भाषण का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा ईरान को लेकर रहा। ट्रंप ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम और अमेरिका-ईरान युद्ध का बचाव किया। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के लिए कार्रवाई की। ट्रंप ने ईरान के सामने दो रास्तों की बात रखी, समझौता या फिर और कठोर सैन्य कार्रवाई। उन्होंने कहा कि वह ईरान के साथ ऐसा समझौता चाहते हैं जिसके जरिए ईरान फिर से निर्माण कर सके, लेकिन अगर समझौता नहीं हुआ तो अमेरिका और ज्यादा कठोर कदम उठा सकता है।

साथ ही उन्होंने उम्मीद जताई कि अमेरिकी मध्यावधि चुनाव के बाद ईरान के साथ समझौता हो सकता है। ट्रंप ने दूसरे देशों से भी ईरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने और उस पर दबाव बढ़ाने की अपील की। इस तरह ईरान को लेकर अमेरिकी नीति में सैन्य दबाव के साथ-साथ आर्थिक और कूटनीतिक दबाव भी दिखाई दिया।

गाजा युद्ध और बंधकों का मुद्दा
ट्रंप ने गाजा का भी उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि उनकी सरकार की कोशिशों से गाजा में युद्ध समाप्त हुआ और बंधकों को वापस लाने में सफलता मिली। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा उनके बताए गए 20-सूत्रीय गाजा शांति योजना के समर्थन का भी उल्लेख किया और इसे क्षेत्र में शांति की दिशा में महत्वपूर्ण कदम के तौर पर पेश किया।

रूस-यूक्रेन युद्ध पर भी नजर
रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध भी ट्रंप के एजेंडे में रहा। उन्होंने युद्ध को समाप्त कराने के लिए अपनी कोशिशों का उल्लेख किया और ऊर्जा ढांचे पर हमलों को लेकर चिंता जताई। ट्रंप का कहना है कि रूस और यूक्रेन के बीच संघर्ष को खत्म किया जाना चाहिए। हालांकि दोनों पक्षों के बीच युद्ध और ऊर्जा ढांचे पर हमले जारी रहने की रिपोर्टें सामने आती रही हैं।

वेनेजुएला पर अमेरिकी शक्ति का प्रदर्शन
ट्रंप ने वेनेजुएला का उदाहरण देते हुए कहा कि अमेरिका पश्चिमी गोलार्ध में अपने राष्ट्रीय हितों के खिलाफ खतरों को स्वीकार नहीं करेगा।
उन्होंने वेनेजुएला के साथ हुए बड़े तेल समझौते का भी उल्लेख किया और दावा किया कि इससे दोनों देशों को आर्थिक फायदा होगा और वैश्विक ऊर्जा लागत को कम करने में मदद मिलेगी। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी हितों की रक्षा के लिए जरूरत पड़ने पर अमेरिका अपनी सैन्य शक्ति का इस्तेमाल करेगा।

क्यूबा और मेक्सिको पर भी सख्त रुख
क्यूबा को लेकर ट्रंप ने कहा कि उनका प्रशासन वहां मूलभूत बदलाव चाहता है। उन्होंने क्यूबा की मौजूदा कम्युनिस्ट व्यवस्था को लेकर बेहद आलोचनात्मक रुख अपनाया और कहा कि उनका प्रशासन इस मुद्दे पर बातचीत कर रहा है। मेक्सिको का जिक्र करते हुए उन्होंने ड्रग कार्टेल और सीमा सुरक्षा का मुद्दा उठाया। ट्रंप ने अमेरिका की दक्षिणी सीमा को राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय बताया और कार्टेल के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जरूरत पर जोर दिया।

अवैध इमिग्रेशन पर ट्रंप का संदेश
अमेरिकी राष्ट्रपति ने अवैध इमिग्रेशन के खिलाफ अपनी नीति को भी प्रमुखता से रखा। उन्होंने कहा कि किसी देश को अपनी सीमाओं पर नियंत्रण और अपनी संप्रभुता बनाए रखने का अधिकार है। ट्रंप ने बड़े पैमाने पर होने वाले अवैध प्रवासन की आलोचना की और अमेरिकी सीमा सुरक्षा को अपनी सरकार की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल बताया।

ग्रीनलैंड: अमेरिका की बढ़ती रणनीतिक दिलचस्पी
भाषण के व्यापक संदर्भ में ग्रीनलैंड भी महत्वपूर्ण मुद्दा रहा। अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के बीच एक रणनीतिक समझौते की दिशा में आगे बढ़ने की बात सामने आई है। इसका संबंध ग्रीनलैंड में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी और आर्कटिक क्षेत्र की सुरक्षा से है। ग्रीनलैंड अभी भी डेनमार्क का हिस्सा है। ट्रंप लंबे समय से इस क्षेत्र के रणनीतिक महत्व पर जोर देते रहे हैं।

AI पर ट्रंप का अलग रुख
ट्रंप ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI को भी अपने भाषण का हिस्सा बनाया। उन्होंने AI पर वैश्विक नियंत्रण की कोशिशों का विरोध किया और कहा कि अमेरिका अपनी तकनीकी बढ़त को सीमित करने वाले अंतरराष्ट्रीय नियमों को स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने AI के लिए “super intelligence” शब्द के इस्तेमाल पर भी जोर दिया और इसे भविष्य की शक्ति से जोड़ते हुए कहा कि इस क्षेत्र में नेतृत्व हासिल करना बेहद महत्वपूर्ण है।

UN और वैश्विक संस्थाओं पर भी सवाल
ट्रंप ने लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र और कुछ अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को लेकर अपनी आलोचना दोहराई। उनके भाषण में यह संदेश भी दिखाई दिया कि अमेरिका अपनी विदेश नीति में अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की तुलना में राष्ट्रीय संप्रभुता और अमेरिकी हितों को अधिक महत्व देता है। उनके भाषण के प्रकाशित पूर्ण-पाठ के अनुसार उन्होंने अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और वैश्विक नियंत्रण की कुछ व्यवस्थाओं पर भी सवाल उठाए।

क्या है ट्रंप के पूरे भाषण का बड़ा संदेश?
ट्रंप के भाषण को देखें तो इसमें केवल ईरान या मध्य-पूर्व की बात नहीं थी। उनका व्यापक संदेश यह था कि अमेरिका अपनी सैन्य, आर्थिक और तकनीकी ताकत का इस्तेमाल अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए करेगा। ईरान के मामले में जहां सैन्य दबाव के साथ समझौते का रास्ता खुला रखने की बात दिखाई दी, वहीं यूक्रेन में युद्ध समाप्त करने, गाजा में शांति योजना, वेनेजुएला में अमेरिकी हितों, सीमा सुरक्षा और AI में अमेरिकी तकनीकी बढ़त जैसे मुद्दों को भी उन्होंने एक ही व्यापक विदेश नीति के हिस्से के रूप में पेश किया।

अगर पूरे भाषण को एक लाइन में समझें तो ट्रंप का संदेश मोटे तौर पर यह था कि “अमेरिका ने अपनी ताकत का इस्तेमाल करके उन समस्याओं पर कार्रवाई की है जिन्हें पिछली सरकारें लंबे समय से टालती रही थीं. ईरान, वेनेजुएला, रूस-यूक्रेन, सीमा सुरक्षा, और अब तकनीक व राष्ट्रीय सुरक्षा में अमेरिकी प्रभुत्व।” यानी ईरान भाषण का सबसे विस्फोटक हिस्सा था, लेकिन पूरा भाषण केवल ईरान पर नहीं था और एक खास बात कि ट्रंप ने खुद को एक ऐसे नेता के रूप में पेश किया जो “बात करने के बजाय कार्रवाई करता है” और इसी दावे को उन्होंने ईरान, वेनेजुएला और दूसरे अंतरराष्ट्रीय मुद्दों से जोड़कर प्रस्तुत किया।

ट्रंप का यह भाषण ऐसे समय हुआ है जब ईरान युद्ध, गाजा, रूस-यूक्रेन संघर्ष, तेल आपूर्ति और AI को लेकर वैश्विक स्तर पर गंभीर चिंताएं बनी हुई हैं। इसलिए उनके भाषण का असर केवल अमेरिका की घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि आने वाले समय में मध्य-पूर्व, ऊर्जा बाजार, यूरोप और वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है।

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