नई दिल्ली/न्यूयार्क: जरा सोचिए एक तरफ अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध चल रहा है। दोनों देश एक-दूसरे के खिलाफ सैन्य कार्रवाई कर रहे हैं। धमकियां दी जा रही हैं, मिसाइलें चल रही हैं और दुनिया इस टकराव के अगले मोड़ पर नजर टिकाए हुए है, लेकिन इसी युद्ध के बीच एक ऐसा दृश्य सामने आता है, जो अंतरराष्ट्रीय राजनीति के कई सवाल खड़े कर देता है.
दरअसल अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध अभी जारी है और इसी बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान और विदेश मंत्री अब्बास अराघची को न्यूयॉर्क आकर संयुक्त राष्ट्र महासभा में शामिल होने की अनुमति अमेरिका ने दी, लेकिन इसी समय फिलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास को अमेरिका ने वीजा देने से इनकार कर दिया। यही अंतर अब अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक बड़ा सवाल बन गया है. आखिर युद्ध लड़ रहे ईरान को UN आने की अनुमति और फिलिस्तीन के राष्ट्रपति को रोकने की वजह क्या है?
रॉयटर्स की रिपोर्ट में क्या सामने आया?
रॉयटर्स की 17 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 152-3 वोट से महमूद अब्बास को वीडियो के जरिए महासभा को संबोधित करने की अनुमति दी। अमेरिका ने अब्बास का वीजा रोक दिया था। अमेरिकी विदेश विभाग ने कहा कि फिलिस्तीनी अधिकारियों पर वीजा प्रतिबंध इसलिए बढ़ाए गए क्योंकि अमेरिका के अनुसार फिलिस्तीनी नेतृत्व ने ऐसे कदम उठाए हैं, जो इजरायल-फिलिस्तीन विवाद को अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं तक ले जाते हैं, जिसमें अंतरराष्ट्रीय अदालतों में इजरायल के खिलाफ मामले भी शामिल हैं।
अमेरिका का कहना है कि फिलिस्तीनी प्राधिकरण को अगर अमेरिका के साथ साझेदार की तरह व्यवहार चाहिए तो उसे कुछ नीतियों में बदलाव करना होगा, लेकिन फिलिस्तीनी पक्ष ने इस फैसले को खारिज किया है। अब इसी तस्वीर का दूसरा हिस्सा देखिए। अमेरिका और ईरान के बीच महीनों से युद्ध चल रहा है। यह संघर्ष 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमले से शुरू हुआ था और उसके बाद ईरान ने इजरायल तथा अमेरिकी सैन्य ठिकानों वाले खाड़ी देशों पर जवाबी हमले किए। इसके बावजूद अमेरिका ने ईरान के राष्ट्रपति पेज़ेश्कियान और विदेश मंत्री अराघची को UN महासभा में आने की अनुमति दी।
इसे लेकर अमेरिकी प्रशासन का आधिकारिक तर्क है कि UN के मेजबान देश के रूप में अमेरिका की कुछ जिम्मेदारियां हैं। ईरानी प्रतिनिधिमंडल को अनुमति दी गई, हालांकि उसके लिए यात्रा और अन्य गतिविधियों पर कुछ प्रतिबंध रखे गए हैं और इसका एक कूटनीतिक अर्थ भी है। युद्ध के बावजूद संवाद का दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। UN जैसे मंच पर ईरान अपने पक्ष को दुनिया के सामने रख सकता है और अमेरिका भी उसके नेतृत्व के साथ उसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर कूटनीतिक रूप से पेश आ सकता है।
फिलिस्तीन के मामले में इतना सख्त रुख क्यों?
ट्रंप प्रशासन ने दूसरी बार फिलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास समेत उच्चस्तरीय फिलिस्तीनी प्रतिनिधिमंडल के वीजा रोका है. अमेरिकी विदेश विभाग ने इसके पीछे फिलिस्तीनी प्राधिकरण की नीतियों का हवाला दिया। अमेरिका ने कहा कि फिलिस्तीनी नेतृत्व ने इजरायल के साथ शांति प्रक्रिया से जुड़ी अपनी कुछ प्रतिबद्धताओं को पूरा नहीं किया और इजरायल के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय अदालतों में कानूनी कार्रवाई जारी रखी। इस फैसले को अमेरिका और इजरायल के करीबी गठबंधन के व्यापक संदर्भ में भी देखा जा रहा है। यानी यहां दो बातें एक साथ मौजूद हैं. अमेरिका का आधिकारिक कारण और फिलिस्तीनी नेतृत्व की नीतियां और अमेरिकी कानून,
अमेरिका-इजरायल के बीच गहरा रणनीतिक गठबंधन
सवाल ये भी है कि क्या इजरायल ने ट्रंप प्रशासन पर दबाव डालकर अब्बास का वीजा रुकवाया। तो ये बात भी सही हो सकती है और इस पर चर्चा भी जारी है. अमेरिका-इजरायल के करीबी गठबंधन और गाजा युद्ध के व्यापक संदर्भ में कई बड़े मीडिया हाउस ने इसे रखा है। यानी यह कहना ज्यादा सटीक होगा कि अमेरिका की फिलिस्तीन नीति और उसकी इजरायल नीति एक-दूसरे से अलग करके देखना मुश्किल है, लेकिन इस खास वीजा फैसले में इजरायल के प्रत्यक्ष दबाव का सार्वजनिक प्रमाण सामने नहीं आया है।
UN में बना एक असामान्य अंतर
इस बार संयुक्त राष्ट्र में सबसे महत्वपूर्ण तस्वीर शायद यही है कि अमेरिका से युद्ध के बावजूद राष्ट्रपति पेज़ेश्कियान UN महासभा में मौजूद हैं और फिलिस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास को अमेरिकी वीजा नहीं मिला और उन्हें वीडियो के जरिए अपनी बात रखनी पड़ी। रॉयटर्स के मुताबिक UN महासभा ने सिर्फ इस साल के लिए नहीं, बल्कि अगले एक साल तक कुछ UN बैठकों में फिलिस्तीनी उच्चस्तरीय अधिकारियों को वीडियो के जरिए भाग लेने की अनुमति देने का रास्ता भी बनाया है। यानी फिलिस्तीन को पूरी तरह बोलने से नहीं रोका गया, लेकिन उसके राष्ट्रपति की व्यक्तिगत मौजूदगी पर अमेरिकी वीजा नीति ने रोक लगा दी।
असली कूटनीतिक संदेश क्या है?
इस पूरे घटनाक्रम को सिर्फ “किसे वीजा मिला और किसे नहीं” के रूप में देखना शायद अधूरा होगा। ईरान के मामले में अमेरिका के सामने एक युद्धरत देश है, लेकिन साथ ही एक ऐसा देश भी है जिसके साथ भविष्य में युद्ध रोकने और समझौते की संभावनाओं पर बातचीत करनी पड़ सकती है। इसीलिए युद्ध के बीच भी UN का मंच खुला रखा गया है।
फिलिस्तीन के मामले में अमेरिका का रुख अलग है। वॉशिंगटन फिलिस्तीनी नेतृत्व पर राजनीतिक और कानूनी दबाव बनाए हुए है और इजरायल के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय कानूनी कार्रवाई को लेकर भी आपत्ति जता रहा है और यही अंतर अब दुनिया के सामने एक बड़ा सवाल रखता है. क्या यह सिर्फ अमेरिकी कानून और विदेश नीति का फर्क है, या अमेरिका-इजरायल के रणनीतिक रिश्ते भी इस पूरे रुख की पृष्ठभूमि में भूमिका निभा रहे हैं? संयुक्त राष्ट्र के इस मंच पर अब सिर्फ अमेरिका और ईरान की जंग नहीं दिखाई दे रही, बल्कि यह भी दिखाई दे रहा है कि वॉशिंगटन किसके साथ बातचीत का रास्ता खुला रखता है और किस पर राजनीतिक दबाव बढ़ाता है।
