नई दिल्ली। BRICS को अक्सर अमेरिका और पश्चिमी देशों के प्रभाव के सामने उभरती अर्थव्यवस्थाओं के एक बड़े समूह के तौर पर देखा जाता है। लेकिन BRICS को सिर्फ “एंटी-वेस्ट” क्लब समझना इसकी पूरी तस्वीर नहीं है। यह न NATO जैसा सैन्य गठबंधन है और न ही यूरोपीय संघ जैसा राजनीतिक संघ। इसकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि अलग-अलग हितों वाले बड़े विकासशील देश एक ही मंच पर बैठकर आर्थिक, राजनीतिक और वैश्विक शासन से जुड़े मुद्दों पर साझा जमीन तलाशते हैं।

BRICS बना कैसे और इसका मकसद क्या है?

BRICS शब्द सबसे पहले 2001 में अर्थशास्त्री जिम ओ’नील ने Brazil, Russia, India और China की तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए इस्तेमाल किया था। 2009 में इन देशों का पहला शिखर सम्मेलन हुआ और 2011 में South Africa के शामिल होने के बाद इसका नाम BRICS हुआ। इसके बाद समूह का विस्तार हुआ और आज इसमें 11 सदस्य हैं—ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, यूएई और इंडोनेशिया सहित कुल 11 देश।

BRICS का असली उद्देश्य क्या है?

इस समूह का मूल मकसद सदस्य देशों के बीच आर्थिक और राजनीतिक सहयोग बढ़ाना, व्यापार और निवेश को मजबूत करना तथा Global South की आवाज को अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में ज्यादा प्रभावी बनाना है। BRICS संयुक्त राष्ट्र, IMF, World Bank और WTO जैसी संस्थाओं में ज्यादा प्रतिनिधित्व और सुधार की मांग भी करता रहा है।

सबसे बड़ी सफलता: सिर्फ बयान नहीं, बना अपना बैंक

BRICS की सबसे ठोस उपलब्धियों में New Development Bank यानी NDB को माना जाता है। 2015 में बने इस बैंक का उद्देश्य बुनियादी ढांचे और सतत विकास के लिए वित्त उपलब्ध कराना है। Reuters के अनुसार NDB अब तक करीब 43 अरब डॉलर के प्रोजेक्ट्स को वित्तपोषित कर चुका है। यही वह जगह है जहां BRICS की कोशिश सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी से आगे जाकर संस्थागत रूप लेती दिखाई देती है।

BRICS की कमजोरी भी कम नहीं

BRICS जितना बड़ा हुआ है, उतना ही विविध भी हो गया है। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद, रूस-पश्चिम तनाव, ईरान और खाड़ी देशों के अलग-अलग हित तथा सदस्य देशों की अलग-अलग विदेश नीतियां किसी एक मुद्दे पर सहमति बनाना मुश्किल करती हैं। BRICS में फैसले आम तौर पर सर्वसम्मति से लिए जाते हैं और इसका कोई स्थायी सचिवालय भी नहीं है। यही इसकी लचीलापन और कमजोरी—दोनों है।

2026 में भारत ने BRICS को किस दिशा में धकेला?

2026 में भारत की अध्यक्षता में BRICS का फोकस Resilience, Innovation, Cooperation और Sustainability पर रहा। भारत ने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, AI, स्वास्थ्य, उद्योग, MSME, ऊर्जा और Global South की भूमिका जैसे मुद्दों को आगे बढ़ाया। भारतीय अध्यक्षता के दौरान 50 से ज्यादा व्यावहारिक परिणामों का दावा भी किया गया।

डॉलर की जगह अभी साझा मुद्रा नहीं

BRICS 2026 को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा “BRICS Currency” की होती रही, लेकिन इस बार कोई साझा BRICS मुद्रा लॉन्च नहीं हुई। इसके बजाय सदस्य देशों ने स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और तेज, सुरक्षित सीमा-पार भुगतान व्यवस्था को आगे बढ़ाने पर जोर दिया। यानी रणनीति अचानक डॉलर खत्म करने की नहीं, बल्कि भुगतान के विकल्प बढ़ाने की दिशा में है।

भारत को क्या मिला? मोदी का ‘पिरामिड’ वाला संदेश

नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मौजूदा वैश्विक व्यवस्था को “पिरामिड ऑफ प्रिविलेज” के रूप में देखने की बात रखी और Global South को केवल नियम मानने वाला नहीं, बल्कि नियम बनाने वाला बनाने पर जोर दिया। भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में सुधार की मांग भी मजबूती से रखी।

इस बार BRICS की असली परीक्षा भी हुई

दिलचस्प बात यह है कि BRICS की एकता का सबसे बड़ा टेस्ट भी इसी सम्मेलन में सामने आया। ईरान और UAE जैसे देशों के बीच पश्चिम एशिया के संघर्ष को लेकर मतभेद थे और विदेश मंत्रियों की पिछली बैठक में सर्वसम्मति वाला बयान तक नहीं निकल पाया था। इसके बावजूद नई दिल्ली में लंबी बातचीत के बाद संयुक्त घोषणा पर सहमति बन गई। यही BRICS की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक उपलब्धियों में से एक मानी जा सकती है—क्योंकि यहां एक जैसी सोच वाले नहीं, बल्कि अलग-अलग हितों वाले देश साथ बैठते हैं।

तो कितना सफल है BRICS?

BRICS को न तो पूरी तरह सफल कहना सही होगा और न ही इसे सिर्फ दिखावे का मंच। NDB, स्थानीय मुद्रा में वित्त, भुगतान प्रणालियों पर सहयोग और Global South की सामूहिक आवाज इसकी वास्तविक उपलब्धियां हैं। लेकिन साझा विदेश नीति, तेज निर्णय लेने और चीन-भारत जैसे मतभेद इसकी सीमाएं भी साफ करते हैं। इसलिए BRICS की असली सफलता इस बात में होगी कि यह घोषणाओं से आगे निकलकर कितने ठोस आर्थिक और संस्थागत विकल्प खड़े कर पाता है।

BRICS अमेरिका के खिलाफ नहीं, विकल्पों के पक्ष में?

इस बार दिल्ली से निकला सबसे बड़ा संदेश शायद यही है कि BRICS को केवल पश्चिम-विरोधी मंच बनाने के बजाय बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का मंच बनाने की कोशिश हो रही है। भारत की रणनीति भी इसी दिशा में दिखती है—अमेरिका से रिश्ते अपनी जगह, रूस-चीन के साथ संवाद अपनी जगह और Global South के लिए अलग सामूहिक आवाज अपनी जगह। अगर BRICS इस संतुलन को बनाए रखता है, तो आने वाले वर्षों में इसकी ताकत सिर्फ सदस्य देशों की संख्या में नहीं, बल्कि दुनिया के फैसलों को प्रभावित करने की क्षमता में दिखाई दे सकती है।

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