नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर कांग्रेस और विपक्ष का आंदोलन अपने शबाब पर है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के सड़क पर उतरने, पुलिस द्वारा रोके जाने और हिरासत में लिए जाने के बाद यह मुद्दा अब महज एक राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रह गया है। कांग्रेस इसे चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता और लोकतंत्र से जोड़ रही है।

आखिर कांग्रेस के लिए इतना बड़ा मुद्दा क्यों है?

इस पूरे विवाद की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी मतदाता सूची में बदलाव और Special Intensive Revision (SIR) को लेकर उठे सवाल हैं। सितंबर में The Indian Express की एक जांच रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयोग के दो अन्य सदस्यों ने पिछले करीब 10 महीनों में आयोग के फैसलों को लेकर कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट में मतदाताओं के नाम जोड़ने और हटाने समेत SIR से जुड़े फैसलों पर आंतरिक मतभेदों का उल्लेख किया गया।

यही रिपोर्ट राहुल गांधी के ‘वोट चोरी’ अभियान के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मोड़ बनी। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि अगर मतदाता का वोट ही सुरक्षित नहीं है तो संविधान, कानून और लोकतांत्रिक संस्थाओं की बुनियाद भी प्रभावित होती है। उन्होंने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते हुए चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए।

क्या रिपोर्ट ने राहुल गांधी के आरोप को साबित कर दिया?

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का जिक्र है, इससे साथ ही यह यह शक और गहरा हो जाता है कि चुनाव में वोट की चोरी हुई है। चुनाव आयोग ने अपने फैसलों का बचाव किया है और बीजेपी ने भी कांग्रेस के आरोपों को खारिज किया है। इसलिए राजनीतिक रूप से यह रिपोर्ट राहुल गांधी के आरोपों को नया आधार देती है, लेकिन ‘वोट चोरी’ के आरोप का अंतिम स्वतंत्र निष्कर्ष इससे नहीं निकलता। ये बात सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद आने वाले फैसले से साफ होगी. 

राहुल गांधी आंदोलन को इतना आगे क्यों ले जा रहे हैं?

राहुल गांधी के लिए यह मुद्दा सिर्फ ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे तक सीमित नहीं है। वह इसे वोटर लिस्ट → वोट → चुनाव → सरकार → लोकतांत्रिक संस्थाओं की पूरी श्रृंखला से जोड़ रहे हैं।

6 अक्टूबर को संसद से चुनाव आयोग की ओर मार्च के दौरान राहुल गांधी और विपक्षी सांसदों को पुलिस ने रोका। इसके बाद राहुल और प्रियंका गांधी समेत कई नेता आकाशवाणी भवन परिसर में धरने पर बैठ गए। राहुल ने कहा कि वह चुनाव आयुक्तों से मिलकर कथित ‘वोट चोरी’ के बारे में सवाल करना चाहते हैं। कई घंटे के बाद पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया।

7 अक्टूबर को आंदोलन दूसरे दिन और आक्रामक हो गया। खरगे के लंच के बाद विपक्षी सांसद जंतर-मंतर की ओर बढ़े, लेकिन पुलिस ने उन्हें वहां पहुंचने से पहले रोक दिया। राहुल और प्रियंका सड़क पर बैठ गए और दोनों को फिर हिरासत में लिया गया। राहुल ने साफ कहा कि ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे तक आंदोलन जारी रहेगा।

चुनाव आयोग का जवाब भी महत्वपूर्ण

इस विवाद का दूसरा पक्ष चुनाव आयोग का है। आयोग ने कहा कि मंगलवार को शाम 4 बजे तक किसी राजनीतिक दल ने औपचारिक बैठक का अनुरोध नहीं किया था। बाद में विपक्ष की ओर से बैठक की मांग सामने आई, लेकिन आयोग के मुताबिक संसद परिसर में बैठक की मांग उसके निर्धारित प्रोटोकॉल के अनुरूप नहीं थी।

यानी विवाद अब दो स्तरों पर चल रहा है—एक तरफ विपक्ष चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची पर सवाल उठा रहा है, दूसरी तरफ चुनाव आयोग अपने संस्थागत प्रोटोकॉल और निर्णय प्रक्रिया का हवाला दे रहा है।

कांग्रेस के आंदोलन का असली राजनीतिक संदेश

कांग्रेस ने इस पूरे विवाद को तीन बड़े सवालों में बदल दिया है—

पहला—क्या मतदाता सूची में बदलाव पूरी तरह पारदर्शी है?

दूसरा—क्या चुनाव आयोग के भीतर लिए जा रहे फैसलों पर सभी आयुक्तों की राय को पर्याप्त महत्व दिया जा रहा है?

तीसरा—क्या चुनाव प्रक्रिया पर जनता का भरोसा कायम है?

यही वजह है कि ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा अब कांग्रेस के आंदोलन का केंद्रीय नारा बन गया है।

हालांकि, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि चुनाव आयोग और बीजेपी कांग्रेस के आरोपों को गलत और निराधार बताते हैं। इसलिए पूरे विवाद का अंतिम निष्कर्ष राजनीतिक आरोपों से नहीं, बल्कि उपलब्ध रिकॉर्ड, चुनावी डेटा, मतदाता सूची में वास्तविक बदलाव और संबंधित संस्थागत जांच से ही निकलेगा।

फिलहाल तस्वीर यह है कि राहुल गांधी की ‘वोट चोरी’ मुहिम को चुनाव आयोग के भीतर मतभेदों से जुड़ी रिपोर्ट के बाद नया राजनीतिक आधार जरूर मिला है, लेकिन इसे ‘वोट चोरी साबित होने’ के बराबर नहीं माना जा सकता। इसी अंतर को समझना इस पूरे विवाद को समझने के लिए सबसे जरूरी है।

और यही कारण है कि ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग अब कांग्रेस के लिए सिर्फ एक व्यक्ति के खिलाफ अभियान नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर बड़ा राजनीतिक संघर्ष बन चुकी है।

कांग्रेस के लिए यह सिर्फ ज्ञानेश का सवाल नहीं

पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक नजरिए से देखें तो कांग्रेस ने इस आंदोलन को ‘वोट’, ‘चुनावी प्रक्रिया’ और ‘लोकतंत्र’ के बड़े नैरेटिव से जोड़ दिया है।

राहुल गांधी लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर विषय है। वहीं बीजेपी का पलटवार है कि कांग्रेस अपनी चुनावी हार की जिम्मेदारी चुनाव आयोग पर डाल रही है और राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश कर रही है।

इस तरह मामला अब सिर्फ एक संवैधानिक संस्था के प्रमुख के इस्तीफे की मांग तक सीमित नहीं रह गया है। यह कांग्रेस बनाम चुनाव आयोग, विपक्ष बनाम सरकार और व्यापक रूप से चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता के सवाल में बदलता जा रहा है।

दो दिन में आंदोलन का पैटर्न साफ

6 अक्टूबर:
संसद से चुनाव आयोग की ओर मार्च → पुलिस ने रोका → आकाशवाणी भवन में धरना → कई घंटे का गतिरोध → राहुल-प्रियंका समेत नेताओं की हिरासत → एफआईआर।

7 अक्टूबर:
खरगे का लंच → विपक्षी सांसद बसों से जंतर-मंतर रवाना → करीब 200 मीटर पहले पुलिस ने रोका → सड़क पर धरना → प्रियंका संविधान की कॉपी लेकर सड़क पर लेटीं → पुलिस से धक्का-मुक्की → राहुल-प्रियंका समेत कई नेताओं की हिरासत।

अब बड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस इस आंदोलन को आने वाले दिनों में और बड़ा करेगी या चुनाव आयोग और विपक्ष के बीच बातचीत का कोई रास्ता निकलेगा। फिलहाल राहुल गांधी के तेवरों से इतना साफ है कि कांग्रेस ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को आसानी से छोड़ने के मूड में नहीं है।

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