नई दिल्ली: चुनाव आयोग के भीतर फैसलों को लेकर कथित मतभेदों पर अंग्रेजी अखबार ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट सामने आने के बाद देश में सियासी और संवैधानिक बहस तेज हो गई है। एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि दो चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में आयोग के कुछ फैसलों और निर्देशों पर कई बार आपत्ति दर्ज की। इसके बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठा कि आखिर चुनाव आयोग के भीतर फैसले लेने की प्रक्रिया कैसे काम करती है और क्या सभी महत्वपूर्ण फैसले तीनों आयुक्तों की सहमति से लिए गए? अब इन सवालों के बीच चुनाव आयोग ने अपना पक्ष स्पष्ट किया है।

आयोग ने एक प्रेस नोट जारी कर कहा कि, अलग-अलग मुद्दों पर अधिकारियों की राय अलग हो सकती है, लेकिन अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए जाते हैं। आयोग ने यह भी कहा कि मतभेद या सुझाव किसी संस्थान की सामान्य निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हैं। उपलब्ध सामग्री के मुताबिक, चुनाव आयोग ने कहा है कि मतभेद होने के बावजूद अंतिम निर्णय मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी के साथ लिए गए।

विवाद की शुरुआत कैसे हुई?

यह पूरा विवाद मीडिया रिपोर्ट के बाद सामने आया। रिपोर्ट में दावा किया गया कि दो चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज की। ये आपत्तियां मतदाता सूची में बदलाव, नाम हटाने और उससे जुड़े फैसलों तथा निर्देशों को लेकर थीं। रिपोर्ट के अनुसार, कुछ मामलों में दोनों आयुक्तों ने कहा कि संबंधित फैसले उनकी सहमति के बिना जारी किए गए।

चुनाव आयोग ने क्या कहा?

रिपोर्ट सामने आने के बाद चुनाव आयोग ने इन सवालों का जवाब दिया। आयोग का कहना है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण समेत उसके फैसले सर्वसम्मति से लिए गए। आयोग के अनुसार, मतदाता सूची को ठीक करने की प्रक्रिया के दौरान कुछ मुद्दों पर चिंता या सुझाव सामने आना अलग बात है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि अंतिम फैसला किसी एक अधिकारी ने अकेले लिया।

आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके कामकाज से जुड़े नियमों में जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से फैसला लेने की व्यवस्था है। यदि किसी मुद्दे पर सहमति न बने तो बहुमत के आधार पर निर्णय लेने का प्रावधान भी है।

14 आपत्तियों का मुद्दा क्या है?

रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने अलग-अलग मौकों पर आयोग के कुछ कदमों पर आपत्ति दर्ज की थी।

इनमें मतदाता सूची से नाम हटाने, मतदाता संबंधी आंकड़ों के प्रबंधन और विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े मुद्दे शामिल बताए गए हैं। एक दिन में अधिकतम चार आपत्तियां दर्ज होने की बात भी रिपोर्ट में कही गई है।

हालांकि, यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि किसी आंतरिक टिप्पणी या आपत्ति का दर्ज होना अपने आप में अंतिम निर्णय के खिलाफ संवैधानिक या कानूनी निष्कर्ष साबित नहीं करता। इसके लिए संबंधित मूल दस्तावेज, आदेश और पूरी प्रक्रिया को देखना जरूरी होगा।

यही इस पूरे विवाद का सबसे अहम संवैधानिक सवाल ये है कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त अकेले फैसला कर सकते हैं? भारतीय निर्वाचन आयोग तीन सदस्यीय संस्था के तौर पर काम करता है। मौजूदा व्यवस्था में मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ दो चुनाव आयुक्त हैं। उपलब्ध सामग्री में भी आयोग की निर्णय प्रक्रिया को तीनों अधिकारियों से जुड़ी संस्था के रूप में बताया गया है।

इसलिए बहस सिर्फ इस बात पर नहीं है कि 14 आपत्तियां क्यों दर्ज हुईं, बल्कि असली सवाल यह है कि इन आपत्तियों के बाद अंतिम फैसले किस प्रक्रिया से लिए गए और क्या सभी संबंधित आयुक्तों को उनकी जानकारी थी।

SIR को लेकर भी सवाल

रिपोर्ट के अनुसार, बिहार से शुरू हुई मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया बाद में कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक पहुंची। इसी दौरान नए मतदाताओं के पंजीकरण, पुराने नामों और अपील से जुड़े मुद्दे सामने आए।रिपोर्ट में दावा किया गया कि इसी प्रक्रिया के दौरान आयोग के भीतर भी अलग-अलग राय सामने आई।

विपक्ष ने क्या कहा?

रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। ममता बनर्जी, राहुल गांधी, संजय राउत, मनीष तिवारी और अखिलेश यादव समेत कई नेताओं ने इस मुद्दे को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त पर निशाना साधा। हालांकि, विपक्ष के आरोपों और रिपोर्ट में सामने आए तथ्यों को अलग-अलग समझना जरूरी है।

उपलब्ध रिपोर्ट यह बताती है कि आयोग के भीतर कुछ मुद्दों पर आपत्तियां दर्ज की गईं। इससे अपने आप यह साबित नहीं होता कि किसी चुनाव में मतदाताओं के साथ जानबूझकर गलत किया गया या किसी राजनीतिक दल को चुनावी फायदा पहुंचाने के लिए मतदाता सूची में बदलाव किया गया।

अब सबसे बड़े सवाल क्या हैं?

इस पूरे विवाद के बाद कुछ सवाल महत्वपूर्ण हो गए हैं—

पहला, जिन फैसलों पर आपत्ति दर्ज हुई, उन पर अंतिम निर्णय किस प्रक्रिया से लिया गया?

दूसरा, 14 आपत्तियों में से प्रत्येक पर आयोग ने क्या कार्रवाई की?

तीसरा, यदि किसी मुद्दे पर आयुक्तों की अलग राय थी तो अंतिम निर्णय तक पहुंचने की प्रक्रिया क्या रही?

चौथा, मतदाता सूची और उससे जुड़े आंकड़ों के प्रबंधन में अधिकारियों की भूमिका कितनी रही?

पांचवां, क्या इन सभी मामलों से जुड़ी मूल फाइलें, आदेश और संबंधित पत्राचार सार्वजनिक किए जाएंगे?

फिलहाल चुनाव आयोग का स्पष्ट पक्ष है कि अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए और केवल आंतरिक टिप्पणियों या आपत्तियों के आधार पर आयोग की अंतिम निर्णय प्रक्रिया पर निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए। दूसरी ओर, रिपोर्ट में उठाए गए सवालों ने आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली और पारदर्शिता को लेकर बहस जरूर तेज कर दी है।

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