नई दिल्ली: बिहार से शुरू हुआ SIR का मामला अब एक बार फिर नए सिरे से तूल पकड़ चुका है. इस बार ये मामला विपक्ष की तरफ से नहीं बल्कि खुद चुनाव आयोग के अंदर से उठा है. ये पूरा विवाद दो चुनाव आयुक्त के जरिए दर्ज आपत्तियों के बाद सामने आया है. दरअसल 23 सितंबर 2026 को The Indian Express की एक विस्तृत रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयोग के तीन सदस्यों में से दो- सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले लगभग 10 महीनों में कम-से-कम 14 बार चुनाव आयोग के आदेश पर लिखित रूप से आपत्तियां दर्ज कीं।
आखिर विवाद क्या है?
इस रिपोर्ट के सामने आते ही देश में एक बार फिर चुनाव आयोग के फैसले और आदेश को लेकर बवाल मच गया. इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में आयोग के फैसलों और प्रक्रियाओं पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट में दावा है कि कुछ फैसले उनकी जानकारी या सहमति के बिना लिए गए। सबसे अहम विवाद मतदाता सूची और SIR को लेकर है.
रिपोर्ट के मुताबिक—
- नए मतदाता के Form-6 में ऐसा विवरण जोड़ा गया जिसमें आवेदक से उसके माता-पिता/दादा-दादी के पुराने SIR वोटर रोल में होने की जानकारी मांगी गई।
- दोनों आयुक्तों ने इस बदलाव के अधिकार और प्रक्रिया पर सवाल उठाए।
- राज्य स्तर के चुनाव अधिकारियों की ERONet/वोटर डेटाबेस तक पहुंच सीमित होने को लेकर भी आपत्तियां दर्ज की गईं।
- पश्चिम बंगाल में कुछ मतदाताओं के नाम बरकरार रखने वाले न्यायिक अधिकारियों के फैसलों के खिलाफ दाखिल अपीलों की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए।
निशाने पर ज्ञानेश कुमार
दरअसल ये आपत्तियां जिस आयोग के फैसलों से जुड़ी थीं, उसकी अध्यक्षता CEC ज्ञानेश कुमार कर रहे हैं और दोनों चुनाव आयुक्तों की लिखित आपत्तियां उन्हें भी भेजी गई थीं। इसी वजह से विपक्ष ने सीधे CEC की जवाबदेही पर सवाल उठाए हैं, लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण पक्ष भी है कि चुनाव आयोग के सूत्रों ने इन रिपोर्टों की व्याख्या को खारिज करते हुए कहा है कि SIR समेत आयोग के फैसले तीनों सदस्यों की मंजूरी से सर्वसम्मति से लिए गए। आयोग का कहना है कि व्यक्तिगत स्तर पर अलग राय होना और अंतिम निर्णय में असहमति होना अलग बातें हैं।
विवाद इतना बड़ा क्यों है?
बता दें कि ये मामला सिर्फ CEC और दो आयुक्तों के बीच मतभेद का नहीं है। सवाल यह है कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और बहाल करने जैसे फैसले आखिर किस प्रक्रिया से लिए जा रहे हैं और आयोग के भीतर सामूहिक निर्णय की व्यवस्था कितनी प्रभावी है। 2023 के कानून के तहत तीनों आयुक्त आयोग का हिस्सा हैं और मतभेद की स्थिति में बहुमत से फैसला होने का प्रावधान है। वहीं, आयोग के कामकाज में जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति की बात भी कानून में कही गई है।
रिपोर्ट में दोनों आयुक्तों के जरिए कुछ कदमों को “unauthorised” और “illegal” कहे जाने का भी उल्लेख है। यही वजह है कि अब मामला SIR से निकलकर चुनाव आयोग की संस्थागत कार्यप्रणाली और CEC की भूमिका पर बहस तक पहुंच गया है। विपक्ष CEC के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहा है, जबकि चुनाव आयोग और सत्तारूढ़ पक्ष इन आरोपों को खारिज कर रहे हैं।
