“लोग खूब करते हैं नेकियाँ मदीने में,
चूमते हैं रोज़े की जालियाँ मदीने में।”
नातिया शायरी के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान रखने वाले अल्लामा जाबिर हुसैन जाबिर सिद्दीक़ी का नाम उन चुनिंदा शायरों में शुमार किया जाता है, जिन्होंने नातिया अदब को केवल शायरी की खूबसूरत ज़बान तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसमें इश्क़-ए-रसूल ﷺ की गहराई और दिली कैफ़ियत को भी उजागर किया है।
नातिया शायरी सबसे कठिन फ़न में से एक
जानकारों का मानना है कि हम्द-ए-ख़ुदा के बाद नात-ए-मुस्तफ़ा ﷺ कहना बेहद कठिन और संवेदनशील फ़न है। नात कहने वाले शायर को शब्दों के चयन में अत्यंत सावधानी बरतनी पड़ती है, क्योंकि ज़रा-सी अतिशयोक्ति अक़ीदे की हदों को प्रभावित कर सकती है और कमी रह जाने पर शान-ए-मुस्तफ़ा ﷺ के बयान में कमी का अंदेशा पैदा हो सकता है।इसी वजह से बुज़ुर्गों ने नातिया शायरी को तलवार की धार पर चलने के समान बताया है। यह ऐसा फ़न है, जिसमें इल्म, अदब, एहतराम और इश्क़—चारों का संतुलन बेहद ज़रूरी माना जाता है।
‘नवाए-बे-नवा’ ने पेश की इश्क़ की कैफ़ियत
अल्लामा जाबिर हुसैन सिद्दीक़ी की किताब ‘नवाए-बे-नवा’ को इसी दृष्टि से विशेष महत्व दिया जाता है। उनके कलाम में नातिया शायरी की रवायत के साथ-साथ इश्क़-ए-रसूल ﷺ की वह कैफ़ियत भी दिखाई देती है, जो नात को महज़ शायरी से अलग करके दिल की आवाज़ बना देती है।नातिया शायरी में सिर्फ़ फ़न और अल्फ़ाज़ का होना काफ़ी नहीं माना जाता। इसके लिए दिल में मोहब्बत और अदब की वह कैफ़ियत भी ज़रूरी है, जो आशिक़-ए-रसूल ﷺ के कलाम में महसूस की जा सके।
खानदानी विरासत में मिला इश्क़-ए-रसूल ﷺ
अल्लामा जाबिर हुसैन सिद्दीक़ी को एक खानदानी आशिक़-ए-रसूल के रूप में भी याद किया जाता है। उनके बारे में कहा जाता है कि इश्क़-ए-रसूल ﷺ उन्हें खानदानी विरासत के रूप में मिला है।इमाम-ए-अहले-सुन्नत से मोहब्बत भी इस परिवार के लिए एक बड़ी सआदत और ख़ुशक़िस्मती मानी जाती है। यही वजह है कि उनके नातिया कलाम में अक़ीदत, मोहब्बत और अदबी शऊर का संगम देखने को मिलता है।
नातिया अदब में बढ़ता हुआ नाम
हिंदुस्तान में नातिया शायरी के क्षेत्र में हजारों साहिबान-ए-शऊर और माहिरीन-ए-फ़न मौजूद हैं, लेकिन नात के फ़न में गहराई और गीराई हर किसी के हिस्से में नहीं आती। यह अल्लाह तबारक व तआला की विशेष नेमत है कि वह अपने बंदों में से कुछ को इस फ़न की ख़िदमत के लिए चुनता है।अल्लामा जाबिर हुसैन जाबिर सिद्दीक़ी ने अपनी नातिया शायरी के ज़रिए इस फ़न में अपनी एक अलग पहचान कायम की है। उनके कलाम में फ़न के साथ इश्क़ और अदब की झलक दिखाई देती है।
अहले-फ़न के लिए इस्तफ़ादे का ज़रिया
अल्लामा जाबिर हुसैन सिद्दीक़ी के लिए दुआ की गई है कि अल्लाह तबारक व तआला उनके फ़न में और अधिक जिला और निखार अता फ़रमाए तथा उनकी नातिया शायरी से हिंदुस्तान के अहले-शऊर और अहले-फ़न को फ़ायदा उठाने की तौफ़ीक़ अता फरमाए।नातिया अदब में उनकी सेवाओं और उनके कलाम की अहमियत को इस शेर से भी बयान किया जा सकता है—
“मुद्दत के बाद होते हैं पैदा कहीं वो लोग,
मिटते नहीं हैं दहर से जिनके निशाँ कभी।”
